गेहूं की फसल (Wheat Crop in Hindi): उत्पादन, पोषण, रोग-कीट एवं सम्पूर्ण कृषि जानकारी
Latest Agriculture Notes के अंतर्गत यह लेख पूरी तरह Exam Oriented तरीके से तैयार किया गया है। इसमें AGTA 2025–2026 और UPSSSC Agriculture परीक्षाओं में पूछे जाने वाले गेहूं से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। गेहूं में C₃ प्रकार का कार्बन चक्र पाया जाता है। यह मुख्य रूप से स्व-परागण करने वाली फसल है। गेहूं में दाना : चारा अनुपात = 1 : 1.5 होता है।
गेहूं की सामान्य जानकारी
फसल का नाम : गेहूंवानस्पतिक नाम : Triticum aestivum
कुल : Poaceae (Gramineae)
उपकुल : Pooideae
जनजाति : Triticeae
जन्मस्थान : दक्षिण-पश्चिम एशिया (Fertile Crescent)
गुणसूत्र संख्या : 2n = 42
परागण : स्वपरागण
प्रकृति : रबी की प्रमुख अनाज फसल
गेहूं का परिचय एवं वर्गीकरण
गेहूं का वानस्पतिक नाम Triticum aestivum है। यह Poaceae (Gramineae) कुल का पौधा है। गेहूं की उत्पत्ति दक्षिण-पश्चिमी एशिया (तुर्की क्षेत्र) से मानी जाती है। गेहूं में गुणसूत्रों की संख्या 2n = 42 होती है, इसलिए इसे हेक्साप्लॉइड फसल कहा जाता है। अपनी अधिक उपयोगिता के कारण गेहूं को अनाजों का राजा भी कहा जाता है।
गेहूं पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण अनाज है। इसके दानों में औसतन 11–12% प्रोटीन तथा 68–70% कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। गेहूं में पाया जाने वाला प्रमुख प्रोटीन ग्लूटेन है, जो चपाती बनाने में सहायक होता है।
जलवायु एवं भारत में गेहूं का स्थान
गेहूं की खेती के लिए शीतोष्ण जलवायु सर्वाधिक उपयुक्त होती है। अंकुरण के समय हल्की ठंड, वृद्धि काल में मध्यम तापमान तथा पकने के समय शुष्क मौसम आवश्यक होता है। भारत में अनाज उत्पादन की दृष्टि से गेहूं का स्थान दूसरा है। भारत में सर्वाधिक गेहूं उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है।
मृदा, बीज एवं बुवाई संबंधी जानकारी
गेहूं की फसल के लिए दोमट एवं जलोढ़ मृदा सर्वोत्तम मानी जाती है। उपयुक्त मृदा का pH मान 6.0 से 8.5 के बीच होना चाहिए। गेहूं का बीज कैरीयोप्सिस (Caryopsis) प्रकार का होता है। 1000 दानों का औसत वजन 38–40 ग्राम होता है।
बीज दर 100–125 किग्रा प्रति हेक्टेयर, पंक्ति से पंक्ति दूरी 22.5 सेमी तथा बुवाई की गहराई लगभग 5 सेमी रखी जाती है।
गेहूं की उन्नत किस्में
गेहूं की लंबाई को नियंत्रित करने वाला जीन Rht (Reduced height) है। हरित क्रांति में प्रयुक्त प्रमुख जीन Norin-10 रहा है।
सिंगल जीन उपजाऊ किस्म: सोनालिका
डबल जीन उपजाऊ किस्में: कल्याण सोना, अर्जुन, जनक
ट्रिपल जीन उपजाऊ किस्में: हीरा, मोती, जवाहर, ज्योति
उर्वरक एवं सिंचाई प्रबंधन
गेहूं में उर्वरक की अनुशंसित मात्रा NPK = 120 : 60 : 40 किग्रा/हेक्टेयर है। सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई अवस्था CRI (Crown Root Initiation) होती है।
गेहूं की फसल में प्रमुख सिंचाई अवस्थाएँ
| क्रम संख्या | सिंचाई अवस्था | समय (बुवाई के बाद) |
|---|---|---|
| 1 | क्राउन रूट इनिशिएशन (CRI) | 20–25 दिन |
| 2 | टिलरिंग अवस्था | 40–45 दिन |
| 3 | ज्वाइंटिंग अवस्था | 60–65 दिन |
| 4 | बूटिंग अवस्था | 80–85 दिन |
| 5 | फूल आने की अवस्था | 90–95 दिन |
| 6 | दूध अवस्था | 100–105 दिन |
| 7 | डो अवस्था | 115–120 दिन |
गेहूं के प्रमुख खरपतवार
गेहूं का प्रमुख नकली खरपतवार गुल्ली डंडा है, जो प्रारंभिक अवस्था में गेहूं जैसा दिखाई देता है और उत्पादन में भारी कमी करता है।
गेहूं के प्रमुख कीट
गेहूं की फसल में सेना कीट, दीमक, गुजिया विविल, छोटी इल्ली एवं भंडारण अवस्था में खपरा बीटल प्रमुख कीट हैं।
गेहूं के प्रमुख रोग
गेहूं में भूरी, पीली एवं काली रतुआ, अनावृत कंड, करनाल बंट, गेंगला रोग, टुंडु रोग एवं मोल्या रोग पाए जाते हैं।
अनावृत कंड रोग (Loose Smut)
इस रोग का कारक Ustilago tritici है। यह आंतरिक बीजजनित रोग है। नियंत्रण हेतु विटावैक्स से बीज उपचार, गर्म पानी उपचार तथा सौर ताप विधि अपनाई जाती है।
करनाल बंट रोग
इस रोग का कारक Neovossia indica है। इसमें गेहूं की बालियों से सड़ी मछली जैसी दुर्गंध आती है।
गेंगला एवं मोल्या रोग
गेंगला रोग Anguina tritici तथा मोल्या रोग Heterodera avenae के कारण होता है। मोल्या रोग के नियंत्रण के लिए 3 वर्ष का फसल चक्र सर्वोत्तम उपाय है।
गेहूं की फसल के प्रमुख रोग (Important Points)
| क्रम | रोग / बिंदु | संक्षिप्त जानकारी (Exam Oriented) |
|---|---|---|
| 1 | अनावृत कंड रोग (Loose Smut) | बीजजनित कवक रोग, बालियाँ काले चूर्ण में बदल जाती हैं। |
| 2 | अनावृत कंड का कारक | Ustilago tritici (कवक) |
| 3 | अन्तर्बीजजनित रोग | अनावृत कंड रोग |
| 4 | अनावृत कंड की रोकथाम | बीज उपचार विटावेक्स / कार्बोक्सिन @ 2.5 g/kg |
| 5 | करनाल बंट रोग | दाने आंशिक रूप से सड़ जाते हैं, मछली जैसी दुर्गंध आती है। |
| 6 | करनाल बंट का कारक | Tilletia indica (कवक) |
| 7 | कवर स्मट जैसा रोग | करनाल बंट |
| 8 | गेंगला रोग (Ear Cockle) | दाने गांठ (गॉल) में बदल जाते हैं। |
| 9 | गेंगला रोग का कारक | Anguina tritici (सूत्रकृमि) |
| 10 | गेंगला रोग की रोकथाम | 20% नमक घोल से बीज उपचार |
| 11 | टुंडु रोग / यलो ईयर रॉट | बालियाँ पीली होकर सड़ जाती हैं। |
| 12 | टुंडु रोग का कारक | जीवाणु (Clavibacter) + वाहक Anguina tritici |
| 13 | मोल्या रोग | पौधे बौने रह जाते हैं, जड़ों पर सिस्ट बनती है। |
| 14 | मोल्या रोग का कारक | Heterodera avenae (सिस्ट निमेटोड) |
| 15 | मोल्या रोग की रोकथाम | 3 वर्ष का फसल चक्र अपनाना |
भंडारण कीट एवं चूहा नियंत्रण
गेहूं का सबसे खतरनाक भंडारण कीट खपरा बीटल (Trogoderma granarium) है। नियंत्रण हेतु सेल्फॉस (Aluminium phosphide) की 3 गोलियाँ प्रति टन की दर से प्रयोग की जाती हैं। चूहा नियंत्रण के लिए जिंक फॉस्फाइड एवं ब्रोमाडियोलोन का उपयोग किया जाता है।
UPSSSC विगत वर्षों से पूछें गये प्रश्न
1. गेहूं का अच्छी प्रकार भंडारण करने के लिए न्यूनतम नमी कितनी होनी चाहिए?
(a) 8% से कम
(b) 10% से कम ✔️
(c) 4% से कम
(d) 2% से कम
सही उत्तर: (b) 10% से कम
भंडारण के समय फसलों में नमी की मात्रा (%)👇👇
| फसल | नमी की मात्रा (%) |
|---|---|
| गेहूं | 10% से कम |
| धान | 10–12% |
| दाल | 8–10% |
| सरसों | 10–14% |
2. निम्नलिखित में से किस पर गेहूं की चपाती बनाने का गुण निर्भर करता है?
(a) ग्लूटिन ✔️
(b) ग्लोब्युलिन
(c) ग्लाइसिन
(d) लाइसिन
सही उत्तर: (a) ग्लूटिन
गेहूं में पर्याप्त मात्रा में ग्लूटिन की उपस्थिति के कारण चपाती तथा बेकरी उद्योग में इसकी अधिक मांग होती है। इसके दानों में लगभग 2–3% शर्करा पाई जाती है।
3. प्राचीनतम फसल कौन-सी मानी जाती है?
(a) मक्का
(b) आलू
(c) गेहूं ✔️
(d) धान
4. राष्ट्रीय पौध स्वास्थ्य प्रबंधन संस्थान (NIPHM) के अनुसार, भंडारण के लिए अधिकतम सुरक्षित नमी की मात्रा धान के लिए ________ और गेहूँ के लिए ________ है। [UPSSSC AGTA 2025]
(B) 13%, 15%
(C) 12%, 14%✔️
(D) 15%, 13%
(E) उपर्युक्त में से कोई नहीं



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