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धान की खेती सम्पूर्ण नोट्स | किस्में, रोग, कीट व उत्पादन जानकारी

धान की खेती ( Agriculture Notes pdf in hindi) 

धान भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है तथा खरीफ मौसम की सबसे महत्वपूर्ण फसल मानी जाती है। यह पोस्ट में  बात करेंगे धान की खेती (Rice Cultivation in Hindi) पर आधारित सम्पूर्ण एवं परीक्षा उपयोगी जानकारी प्रदान करता है, जो UPSSSC AGTA, Agriculture Supervisor & Cane Supervisor एवं अन्य कृषि परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।


धान की खेती: Exam Notes

  • वैज्ञानिक नाम – Oryza sativa
  • कुल – Poaceae (Gramineae)
  • गुणसूत्र संख्या – 2n = 24
  • उत्पत्ति स्थान – दक्षिण–पूर्वी एशिया
  • परागण – स्वपरागित फसल
  • पौधा प्रकार – C₃ पौधा

धान का वर्गीकरण

  • इंडिका (Indica) – भारत में उगाई जाती है
  • जैपोनिका (Japonica) – जापान में
  • जावानिका (Javanica) – इंडोनेशिया में
  • Oryza glaberrima – अफ्रीका में

जलवायु एवं तापमान

  • धान उष्ण एवं आर्द्र जलवायु की फसल है
  • अनुकूल तापमान – 30–32°C
  • अधिकतम – 36–38°C | न्यूनतम – 10–12°C
  • फूल आने के समय – 26.5–29.5°C

मृदा की आवश्यकता

  • उपयुक्त मृदा – Clay एवं Clay loam
  • pH मान – 4.5 से 6.5
  • अधिक जल धारण क्षमता आवश्यक

बुवाई का समय (Sowing Time)

  • AUS – अप्रैल–मई
  • AMAN – जून–जुलाई
  • BORO – नवंबर–दिसंबर
धान का प्रकार बुवाई का समय रोपाई का समय कटाई का समय
अस (Aus) अप्रैल – मई मई – जून अगस्त – सितम्बर
अमन (Aman) जून – जुलाई जुलाई – अगस्त नवम्बर – दिसम्बर
बोरो (Boro) दिसम्बर – जनवरी जनवरी – फरवरी अप्रैल – मई

बीज दर (Seed Rate)

  • छिटकाव विधि – 100 kg/ha
  • रोपाई विधि – 60 kg/ha
  • हाइब्रिड धान – 15 kg/ha
  • SRI विधि – 5–6 kg/ha

रोपाई एवं पौध दूरी

  • सामान्य रोपाई – 20 × 20 सेमी
  • हाइब्रिड धान – 20 × 15 सेमी
  • SRI विधि – 25 × 25 सेमी

SRI विधि (System of Rice Intensification)

  • खोज – मेडागास्कर
  • बीज दर अत्यंत कम
  • 10–12 दिन की पौध रोपित
  • पानी, उर्वरक एवं बीज की बचत

धान की प्रमुख किस्में (Rice Varieties) – सम्पूर्ण जानकारी

सिंचित क्षेत्र के लिए किस्में

साकेत-4, गोविंद, प्रभात, जया, पंत-4, सीता, रत्ना, महेश, IR-8, IR-24

असिंचित किस्में

गौरी, तुलसी, अमृत, नरेंद्र-1, झोना-349, कावेरी, नगीना

ऊसर भूमि के लिए किस्में

ऊसर-1, पूसा-2, 21, साकेत-4, T-9, 23, IR-24

जल्दी पकने वाली / सूखा अवरोधी किस्में

बाला, कावेरी

मध्यम अवधि की किस्में

आशा, कांति, अनुपमा, रतन, IR-36

देर से पकने वाली किस्में

सूर्या, गंगा, गरिमा, कांति, फाल्गुनी

सुगंधित किस्में

बासमती-1, कस्तूरी, कुशल, वाल्मीकि, पूसा-21, 33, हंसराज, N-108

प्रकाश संवेदी किस्में

IR-8,जया, पंत धान-4

सिंचाई प्रबंधन

  • जल आवश्यकता – 900–2500 mm
  • सिंचाई की क्रांतिक अवस्था -पेनिकल इनिशिएशन और बूटिंग अवस्था।
  • धान की जल उपयोग दक्षता सबसे कम होती है।
  • खेत में जल स्तर – लगभग 5 सेमी
  • कटाई से 10–15 दिन पहले सिंचाई बंद

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

  • N – 80–120 kg/ha
  • P – 40–60 kg/ha
  • K – 30–40 kg/ha
  • जस्ता की कमी से – खैरा रोग
  • पडलिंग = खेत में कीचड़ बनाना
  • जल धारण क्षमता बढ़ती है
  • खरपतवार नियंत्रण में सहायक

धान‌ के प्रमुख खरपतवार 

  1. घास वर्ग (Grassy Weeds)
    • साँवा / सांवा (Echinochloa crus-galli)
    • स्वाँकी / जंगली धान (Echinochloa colona)
    • लेप्टोच्लोआ (Leptochloa chinensis)
    • इस्चेमम (Ischaemum rugosum)

    ये धान जैसे ही दिखते हैं, इसलिए पहचानना कठिन होता है।

  2. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार (Broad Leaf Weeds)
    • भांगरा (Eclipta alba)
    • मोथा पत्ती / मोनोकॉरिया (Monochoria vaginalis)
    • अमरबेल (Commelina benghalensis)
    • जल कुम्भी (Eichhornia crassipes)

धान के खरपतवार नियंत्रण (Pre & Post Emergence)

  • प्री-इमरजेंस (Pre-Emergence) खरपतवार नाशी
    • ब्यूटाक्लोर (Butachlor)
    • प्रीटिलाक्लोर (Pretilachlor)
    • एनीलोफॉस (Anilofos)
    • पेंडिमेथालिन (Pendimethalin)
    • ऑक्साडायर्जिल (Oxadiargyl)

    प्रयोग समय: बुवाई/रोपाई के 2–3 दिन के अंदर, खरपतवार उगने से पहले।

  • पोस्ट-इमरजेंस (Post-Emergence) खरपतवार नाशी
    • बिसपायरीबैक सोडियम (Bispyribac Sodium)
    • 2,4-D
    • पाइराजोसल्फ्यूरॉन (Pyrazosulfuron)
    • एथॉक्सीसल्फ्यूरॉन (Ethoxysulfuron)
    • पेनॉक्सुलम (Penoxsulam)

    प्रयोग समय: खरपतवार उगने के 15–25 दिन बाद।

धान के प्रमुख कीट 

धान भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है, लेकिन इसकी अच्छी उपज के लिए कीट प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। यदि समय पर नियंत्रण न किया जाए तो कीट 20 से 40 प्रतिशत तक उत्पादन घटा सकते हैं। धान में तना छेदक, पत्ती मोड़क, भूरा फुदका, गंधी कीट और हरी फुदका प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। इनकी सही पहचान और समय पर नियंत्रण से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।

1. धान का तना छेदक (Stem Borer)- सबसे हानिकारक कीटों में से एक है। इसका प्रकोप होने पर पौधे की मध्य पत्ती सूख जाती है जिसे “डेड हार्ट” कहा जाता है, और बालियों की अवस्था में दाने नहीं बनते जिसे “व्हाइट ईयर” कहते हैं। इसके नियंत्रण के लिए क्लोरेंट्रानिलिप्रोल, कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड या फिप्रोनिल का उचित मात्रा में छिड़काव करना चाहिए। खेत में संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर रोपाई भी इसके प्रकोप को कम करती है।

2. पत्ती मोड़क (Leaf Folder)- कीट पत्तियों को मोड़कर अंदर से हरा भाग खा जाता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। अधिक प्रकोप होने पर पत्तियाँ सफेद दिखाई देने लगती हैं। इसके नियंत्रण हेतु इमामेक्टिन बेन्जोएट या क्लोरपायरीफॉस का छिड़काव लाभकारी रहता है।

2. भूरा फुदका (Brown Plant Hopper) पौधों का रस चूसकर उन्हें सूखा देता है, जिससे खेत में “हॉपर बर्न” की स्थिति बन जाती है। यह कीट अधिक नमी और घनी फसल में तेजी से फैलता है। नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड या थायमेथोक्साम का प्रयोग करना चाहिए तथा खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखनी चाहिए।

3. गंधी कीट (Gundhi Bug)- मुख्यतः बालियों की दूधिया अवस्था में दानों का रस चूसता है, जिससे दाने काले या अधूरे रह जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 5% डस्ट का छिड़काव किया जाता है।

4. समेकित कीट प्रबंधन (IPM)- अपनाना धान की फसल के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। इसमें संतुलित उर्वरक उपयोग, समय पर निराई-गुड़ाई, प्रकाश प्रपंच (लाइट ट्रैप) का प्रयोग तथा आवश्यकता होने पर ही कीटनाशकों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग शामिल है। सही प्रबंधन से धान की उपज और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि की जा सकती है।

धान के प्रमुख रोग

1. झुलसा रोग (Blast)- धान का सबसे प्रमुख फफूंदजनित रोग है, जिसका कारण पाइरिकुलारिया ओराइजी (Pyricularia oryzae) है। इसकी पत्तियों पर हीरे के आकार के धब्बे बनते हैं, जो बाद में सूखकर बड़े हो जाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर बालियाँ भी प्रभावित होती हैं। इसके नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम या ट्राइसाइक्लाजोल का छिड़काव किया जाता है तथा संतुलित नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।

2. भूरा धब्बा रोग (Brown Spot)- हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी (Helminthosporium oryzae) के कारण होता है। पत्तियों पर भूरे रंग के गोल धब्बे दिखाई देते हैं। यह रोग पोषक तत्वों की कमी और कमजोर फसल में अधिक फैलता है। इसके नियंत्रण हेतु मैंकोजेब का छिड़काव लाभकारी होता है और संतुलित खाद प्रबंधन आवश्यक है।

3. शीथ ब्लाइट (Sheath Blight)- राइजोक्टोनिया सोलानी (Rhizoctonia solani) नामक फफूंद से होता है। यह तनों की बाहरी आवरण (शीथ) पर भूरे धब्बे बनाता है और पौधे को कमजोर कर देता है। अधिक नमी और घनी रोपाई में इसका प्रकोप बढ़ता है। नियंत्रण के लिए वैलिडामाइसिन या हेक्साकोनाजोल का प्रयोग किया जाता है।

4. टुंग्रो रोग (Tungro)- एक विषाणुजनित रोग है, जो हरी फुदका द्वारा फैलता है। इस रोग में पौधे बौने रह जाते हैं और पत्तियाँ पीली हो जाती हैं। नियंत्रण के लिए वाहक कीट (हरी फुदका) का नियंत्रण आवश्यक है तथा प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए।

5. खैरा रोग (Khaira Disease)- धान में जिंक (Zinc) तत्व की कमी से होने वाला एक शारीरिक विकार है। इसमें पत्तियों पर हल्के पीले या भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। यह रोग प्रायः अधिक जलभराव और क्षारीय मिट्टी में देखा जाता है। इसके नियंत्रण के लिए जिंक सल्फेट (ZnSO4) का 0.5% घोल बनाकर छिड़काव करना या मिट्टी में 20–25 किग्रा प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए।

धान की फसल को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए समेकित रोग प्रबंधन (IDM) अपनाना चाहिए, जिसमें रोगमुक्त बीज, संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित जल प्रबंधन और आवश्यकता अनुसार फफूंदनाशकों का वैज्ञानिक प्रयोग शामिल है।

धान में चावल व भूसी (हस्क) का अनुपात

धान में चावल व भूसी का अनुपात सामान्यतः 2:1 होता है।

👉चावल निकालना (Husking / Hulling of Paddy)-धान के दानों से भूसी हटाकर चावल प्राप्त करने की प्रक्रिया को चावल निकालना या हस्किंग कहा जाता है। सामान्यतः धान से लगभग 66% चावल प्राप्त होता है।

धान में चावल का अनुपात 2:1 रहने पर इसे अच्छा माना जाता है।

👉 हुलिंग प्रतिशत (Hulling %) - हुलिंग प्रतिशत = (चावल का प्रतिशत ÷ धान का प्रतिशत) × 100
उदाहरण: 60 ÷ 100 × 100 = 60%

👉 पारबॉयलिंग चावल (Parboiled Rice) - धान को कूटने से पहले गर्म पानी में उबालने की प्रक्रिया को पारबॉयलिंग कहते हैं। इस प्रक्रिया में विटामिन B समूह विशेषकर B1 एवं B2 की मात्रा चावल के अंदर बनी रहती है, जिससे पोषण मूल्य बढ़ जाता है।

उपज (Yield)

  1. असिंचित क्षेत्रों में उपज: 35–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  2. सिंचित क्षेत्रों में उपज: 50–60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  3. सामान्य औसत उपज: 25–30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

महत्वपूर्ण बिन्दु :-

  • भारत में धान की पहली उच्च उपज देने वाली किस्म (HYV) 'IR-8' मानी जाती है।
  • भारत में विकसित पहली बौनी किस्म 'जया' है, जो हरित क्रांति में महत्वपूर्ण रही।
  • विश्व की पहली संकर बासमती किस्म 'PRH-10' है।
  • धान की सूखा सहनशील प्रमुख किस्म 'सहभागी धान' है।
  • धान की जिंक की कमी से 'खैरा रोग' होता है।
  • धान की फसल में चावल और भूसी का अनुपात लगभग 2:1 होता है।
  • धान की प्रकाश-संवेदी किस्मों में 'जया' और 'पंत धान-4' प्रमुख हैं।
  • संकर धान की प्रमुख किस्में – DRRH-1, PRH-10, पूसा RH-10 आदि हैं।
  • भारत में संकर धान के जनक- ई.ए.सिद्दिकी ।
  • जगन्नाथ किस्म- यह एक उत्परिवर्तित किस्म है।
  • सर्वाधिक जल उपयोग दक्षता- रागी।
  • सबसे कम जल उपयोग दक्षता- धान।
  • धान के दोनों को 14% नामी रहने तक सुखना चाहिए।

धान की खेती से संबंधित यह सम्पूर्ण नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे AGTA, Agriculture Supervisor व गन्ना पर्यवेक्षक एवं अन्य कृषि परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इसमें महत्वपूर्ण बिंदु शामिल किए गए हैं।

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