बाजरे की खेती नोट्स 2026 | Pearl Millet Cultivation in Hindi | UPSSSC AGTA Crop Science
बाजरा (Pearl Millet) भारत की प्रमुख खरीफ फसल है। यह कम वर्षा एवं शुष्क क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है। UPSSSC AGTA, गन्ना पर्यवेक्षक, एवं अन्य कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं में बाजरा से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
बाजरा (महत्वपूर्ण बिन्दु)
- वैज्ञानिक नाम: Pennisetum glaucum
- कुल: Poaceae
- उत्पत्ति: अफ्रीका
- गुणसूत्र संख्या: 2n = 14
- प्रकाश अवधि: लघु दिवस पौधा (Short Day Plant)
- प्रकाश संश्लेषण: C4 पौधा
भारत में बाजरा उत्पादन
- सर्वाधिक उत्पादन – राजस्थान
- प्रमुख राज्य – उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र
- खरीफ मौसम की फसल
जलवायु एवं मिट्टी
- इसकी बढ़वार के लिए नाम तथा उष्ण मौसम अधिक उपयुक्त रहता है।
- उपयुक्त तापमान– 28 से 32°C
- वर्षा – 25–30 सेमी
- मिट्टी – बलुई दोमट
बुवाई का समय
| क्षेत्र | बुवाई समय |
|---|---|
| उत्तर भारत | जून – जुलाई |
| दक्षिण भारत | मई – जून |
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
- नाइट्रोजन – 40–60 किग्रा/हेक्टेयर
- फास्फोरस – 20–30 किग्रा/हेक्टेयर
- आधी नाइट्रोजन बुवाई के समय, शेष टॉप ड्रेसिंग
- जिंक सल्फेट - 25 किग्रा.
महत्वपूर्ण तथ्य
- बाजरे की फसल अम्लीय मिट्टियों के प्रति संवेदनशील होती है।
- विश्व में बाजरे का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश – भारत
- All India Coordinated Research Project for Millets – मंडोर, जोधपुर
पोषक तत्व
- प्रोटीन – 11.6%
- वसा – 5.0%
- रेशेदार पदार्थ – 2.7%
- कार्बोहाइड्रेट – 67%
जलवायु
- इसकी बढ़वार के लिए नम तथा उष्ण मौसम अधिक उपयुक्त होता है।
- अच्छी वृद्धि के लिए 28–32°C तापमान उपयुक्त माना जाता है।
बुवाई की विधियाँ
- छिड़काव विधि (Broadcasting)
- कतार विधि (Line Sowing)
- रोपण विधि (Transplanting)
बाजरे की पंक्तियों में बुवाई तकनीक R.C. Gautam द्वारा दी गई।
रोपण विधि विवरण
- नर्सरी क्षेत्र – 500–600 वर्ग मीटर/हेक्टेयर
- बीज की मात्रा – लगभग 2 किग्रा
- 20–25 दिन या 15 सेमी ऊँचाई पर रोपाई करें
अंतरालन (Thinning)
जहाँ अधिक पौधे होते हैं वहाँ से कुछ पौधे निकालकर कम पौधों वाले स्थान पर लगाए जाते हैं।
बीज दर (Seed Rate)
- चारे के लिए – 10-12 किग्रा/हेक्टेयर
- दाने के लिए – 4-5 किग्रा/हेक्टेयर
- पौधरोपण हेतु नर्सरी – 2-2.5 किग्रा/हेक्टेयर
महत्वपूर्ण किस्में
- बाजरे की पहली संकर किस्म 1965 में विकसित किस्म - HB-1 (DS अट्वाल , PAU, लुधियाना)
- HB-1 क्रास --> टीफ्ट -23A (नर बान्ध्य) × बील-3B
- चारे हेतु उपयुक्त किस्म - कम्पोजिट-6
- पहली संकर किस्म जो व्यावसायिक रूप से विकसित हुई -HB-4
- हरितबाली रोग प्रतिरोधी – HHB-6, HC-4, Wee-75, पूसा मोती
- IARI द्वारा विकसित किस्में - HB-4, HB-5, BJ-5, BJ-104, BD-111, BD-163
बाजरे में खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के लगभग 20–30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करना आवश्यक होता है। एट्राजीन (प्री-इमरजेंस) अवस्था में शाकनाशी का प्रयोग 600 लीटर पानी में घोलकर किया जाता है। रूखंडी (स्ट्राइगा एशियाटिका) ये बाजरे का अर्द्ध जड़ परजीवी खरपतवार है इसका नियंत्रण एट्राजीन या 2,4-D का प्रयोग लगभग 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 15 दिन बाद किया जाता है। समय पर खरपतवार नियंत्रण से फसल की वृद्धि एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
बाजरे के प्रमुख रोग
हरित बाल रोग (Green Ear Disease in Bajra)
बाजरे का सबसे प्रमुख रोग हरित बाल रोग है जिसे डाउनी मिल्डयू या जोगिया / तुलासिता रोग भी कहा जाता है। यह रोग Sclerospora graminicola नामक कवक के कारण होता है। भारत में इस रोग का सर्वप्रथम वर्णन वर्ष 1907 में E. J. Butler द्वारा किया गया था।
Father of Indian Plant Pathology- E.J. ButlerFather of world Plant Pathology - एन्टोन डी बेरी
इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर पीली धारियों के रूप में दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त पौधे अविकसित रह जाते हैं और पत्तियाँ पतली हो जाती हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद चूर्ण जैसा पदार्थ दिखाई देता है। बाद की अवस्था में पुष्पक्रम पत्तीनुमा संरचनाओं (leaf like structures) में बदल जाता है, जिसके कारण बालियाँ सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाती हैं।
यह रोग मुख्यतः बीज एवं मिट्टी द्वारा फैलता है। अधिक आर्द्रता एवं अनुकूल तापमान की स्थिति में रोग का प्रकोप अधिक होता है।
हरित बाल रोग का नियंत्रण
रोग की रोकथाम हेतु खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए तथा रोगग्रस्त पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग फसल को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना सबसे प्रभावी उपाय है तथा फसल चक्र अपनाएं तथा संक्रमित पौधों को हटा दें। Raj-171, HHB-67, Wee-75 तथा HB-1 जैसी किस्में को बोए जो कि रोग के प्रति सहनशील मानी जाती हैं।
हरित बाल रोग बाजरे की प्रमुख बीमारी है। इसका कारक Sclerospora graminicola है। भारत में सर्वप्रथम इसका वर्णन E. J. Butler ने किया। यह रोग बीज एवं मिट्टी द्वारा फैलता है। कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं में इन तथ्यों से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
अर्गट रोग (चेपा / गोदिया रोग)
- यह रोग Claviceps fusiformis नामक कवक से होता है।
- यह रोग पुष्पन अवस्था में अधिक दिखाई देता है।
- बालियों पर पहले शहद जैसा चिपचिपा द्रव (Honeydew) निकलता है।
- बाद में दानों के स्थान पर गहरे भूरे या काले रंग की स्क्लेरोशिया बन जाती है।
- रोगग्रस्त बालियों में दाने विकसित नहीं होते।
- अधिक आर्द्रता में रोग का प्रकोप बढ़ता है।
नियंत्रण
- 20% नमक घोल में बीज उपचार करें।
- 5–10% फूल खिल जाए तब कार्बेन्डाजिम 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें या मेन्कोजेब 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
बाजरे का कंडुआ रोग
- यह रोग Moesziomyces parepenicillariae नामक कवक से होता है।
- इसे Tolyposporium penicillariae भी कहते हैं।
- दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है।
- बालियाँ विकृत हो जाती हैं।
- उपज में कमी आती है।
नियंत्रण
- Vitavax 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें।
- स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
कटाई अवस्था
- बुवाई के 90–100 दिन बाद फसल तैयार होती है।
- फसल अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक पक अर तैयार हो जाती है।
- जब दानों में 20- 25% नमी हो तब कटाई करें।
- अधिक नमी पर कटाई से भंडारण समस्या होती है।
उपज
- औसत उपज 15–20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- सिंचित अवस्था में 30–35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- हरा चारा - 250-300कु./हे.।
भंडारण
- भंडारण के समय दानों में नमी 12% से कम होनी चाहिए।
- सुखाकर साफ स्थान पर भंडारण करें।
बाजरे की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
1. बाजरे में हरित बाली रोग (Green Ear Disease) किस कारण होता है?
बाजरे में हरित बाली रोग Sclerospora graminicola नामक कवक के कारण होता है। इस रोग में बालियाँ पत्तियों जैसी हरी संरचना में बदल जाती हैं और दाना नहीं बनता। यह रोग बीज एवं मिट्टी दोनों से फैल सकता है।
2. बाजरे में अर्गट रोग की पहचान कैसे करें?
अर्गट रोग पुष्पन अवस्था में दिखाई देता है। संक्रमित बालियों से शहद जैसा चिपचिपा द्रव निकलता है, जिसे हनीड्यू अवस्था कहते हैं। बाद में काले कठोर दाने (स्क्लेरोशिया) बन जाते हैं।
3. बाजरे के कंडुआ रोग का नियंत्रण कैसे करें?
कंडुआ रोग Moesziomyces penicillariae (Tolyposporium penicillariae) कवक के कारण होता है। नियंत्रण के लिए Vitavax 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार करना चाहिए।
4. बाजरे की फसल कितने दिन में पककर तैयार होती है?
बाजरे की फसल सामान्यतः बुवाई के 90–100 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब दानों में 20–25% नमी रह जाती है, तब कटाई करनी चाहिए।
5. बाजरे की औसत उपज और भंडारण नमी कितनी होनी चाहिए?
बाजरे की औसत उपज 15–20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। भंडारण के समय दानों की नमी 12% से कम होनी चाहिए, जिससे कीट एवं फफूंद से बचाव हो सके।



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